Wednesday, 19 August 2015

आई है बरसात शहर में



आई है बरसात शहर में
                   डॉ. रामवृक्ष सिंह 

आई है बरसात शहर में, रिमिर-झिमिर पड़ रहीं फुहारें।
चिल्ला-चोट मचाते हैं सब, स्कूटर, ऑटो, टैक्सी, कारें।।
     सांसत में फँस गए प्राण हैं, भीड़ छँटे तो दफ्तर पहुँचें।
     शाम वही फिर धक्का-मुक्की, जान बचे वापस घर पहुँचें।।
     सड़क वही, वैसा ही ट्रैफिक, सिर्फ बदलती हैं सरकारें।।
घुटने-घुटने लगता पानी, सड़क नहीं जैसे हो नाला।
इन्हें बनाने का ठेका जो पा जाता मंत्री का साला।।
सत्य-निष्ठ हैं कौन मनुज जो, इन शहरों के भाग्य संवारें।।
            कहाँ खुला सीवर का ढक्कन पानी नीचे, कैसे जानें?
     कहाँ छिपा बैठा है खतरा, मौत कहाँ, कैसे पहचानें?
            भ्रष्टों के इस सप्त-सिन्धु में कैसे जीवन-नाव उतारें?
बिजली का कुछ नहीं ठिकाना, जाकर अब जाने कब आए।
भला नागरिक बिल भर-भरकर बस अपना कर्तव्य निभाए।।
हवा बिना घबराता है जी, उमस में कैसे रात गुजारें।।
            गाँव नहीं जा सकते रहने, वहाँ की आफ़त और बड़ी है।
            सुविधाएं कुछ नहीं हैं लेकिन राजनीति बेहद तगड़ी है।।
            नेताओं पर अब निर्भर है, हमें जिलाएँ या वे मारें।।
वादों की खेती फलदायी, पक्का सौदा, नहीं जुआ है।
अनावृष्टि या अल्पवृष्टि ने इसको अब तक नहीं छुआ है।
आओ वादों के सर्जक नेतागण की आरती उतारें।।

अरे, ज़रा टीवी से कह दो..



अरे ज़रा टीवी से बोलो, कुछ क्षण शान्ति बनी रहने दो।
अपने घर-परिवार की बातें कुछ सबको सुनने-कहने दो।

रोज उसी धारावाहिक की घिसी-पिटी वे ही सब बातें।
जिन्हें देखते कटतीं सबकी शाम सुहानी, रंगीं रातें।

विज्ञापन बेचने की खातिर बुना हुआ यह पिंजरा तोड़ो
जीवन की उद्दाम तरंगों में सबको कुछ दिन बहने दो।।
अरे ज़रा टीवी से बोलो, कुछ क्षण शान्ति बनी रहने दो।

पता नहीं घर वाले सोते कब, और जाने कब जगते हैं
पात्र पराए टीवी के सब किन्तु बहुत अपने लगते हैं। 

मन करता धारावाहिक सब आज अभी से बन्द करा दूँ
उनको भी संबंध बिखरने का थोड़ा-सा गम सहने दो।।
अरे ज़रा टीवी से बोलो, कुछ क्षण शान्ति बनी रहने दो।

दुरभिसंधियों से टीवी की,बैठक की सड़ गईं हवाएं
ऐसे कुटिल कहाँ होते हैं, कहाँ मिलें ऐसी ललनाएँ
आभासी इस इन्द्रजाल को छिन्न-भिन्न कर बाहर निकलो
बच्चों को लोरियाँ पुनः दो, प्रिय को बाँहों के गहने दो।

अरे ज़रा टीवी से बोलो, कुछ क्षण शान्ति बनी रहने दो।

Monday, 17 August 2015

मन, तबीयत, सेहत और स्वास्थ्य

मन, तबीयत, सेहत और स्वास्थ्य
डॉ. रामवृक्ष सिंह

आज एक रिक्शेवाले को अपने साथी रिक्शेवाले से कहते सुना- आज मन नहीं रहा। जिस तरह बु झे हुए स्वर में उसने मन न रहने की बात कही, उससे स्पष्ट था कि आज उसका स्वास्थ्य कुछ खराब था या है। साहित्य और अध्यात्म के क्षेत्र में मन का अभिप्राय हृदय, भावना, चित्त आदि होता है। उदाहरण के लिए, भक्त कवि सूरदास के यहाँ मन का अर्थ है- दिल। इसीलिए गोपियाँ उद्धव से कहती हैं- ऊधौ मन न भए दस-बीस। एक हुतौ सो गयो स्याम संग, को अवराधे ईस।। एक ही दिल था, वह भी श्याम को दे दिया। अब ईश्वर की आराधना के लिए दूसरा दिल कहाँ से लाएँ? मन और मस्तिष्क को लोग अलग-अलग मानते हैं। शरीर-विज्ञान की दृष्टि से मन और मस्तिष्क, दोनों अलग-अलग हैं, यह मानने का कोई कारण नहीं है। जो है तो मस्तिष्क ही है। वही सोचता है, वही विचारता है। वही अनुभव करता है, वही अपनी स्मृति के अनुसार, अच्छा और बुरा मानता है। और जैविक रूप से चाहे वह एक हो, किन्तु प्रायः उसकी वृत्तियाँ अनेक होती हैं। कभी इसको पसंद किया, तो कभी उसको। इसीलिए आदमी अपने जीवन में परिस्थिति और अवस्थानुसार, कई-कई बार प्यार करता है, कई-कई बार घृणा करता है, कई-कई देवताओं से लौ लगाता है। भूलता है, बिसराता है, चकित होता है, पछताता है, भावुक होता है, क्रुद्ध होता है। यानी भावना और चिन्तन के स्तर पर मनुष्य जो भी कुछ करता है या उसके भीतर इन स्तरों पर जो कुछ भी घटित होता है, वह सब मस्तिष्क में ही होता है। दिल तो बदनाम भर है। वह तो एक  उद्वाहक यानी पम्प है, जो एक ओर से खून खींचता है, दूसरी ओर से जोर लगाकर पम्प कर देता है, ताकि रक्त का संचार पूरे शरीर में होता रहे। अलबत्ता जब मस्तिष्क में ज्यादा ऊहा-पोह मची होती है, ऐड्रेनिल बढ़ा होता है या परिश्रम करने के कारण शरीर के अंगों, हाथ-पैर आदि की गति तेज होती है और फेफड़ों को ज्यादा हवा खींचनी-फेंकनी पड़ती है,  तब दिल की ड्यूटी बढ़ जाती है। उसे ज्यादा तेजी से काम करना पड़ता है। शायद इसी कारण लोगों को भ्रम होता था कि भाव-जगत का संबंध दिल है, और चिन्तन तथा विचार-विवेक आदि का दिमाग से। लोगों ने तो बाकायदा कहावत बना दी कि दिल से काम न लेकर दिमाग से काम लेना चाहिए, जबकि सच्चाई यह है कि जिसे दिल से यानी भावना से काम लेना कहते हैं, वह भी उसी मशीन में होता है, जिसे दिमाग कहते हैं। खैर...।
उर्दू इदारों में मन को ही तबीयत कहा जाता है। इसे कुछ लोग तबियत भी लिखते हैं, किन्तु उच्चारण को देखते हुए हमें ब में दीर्घ ई लिखना ही उपयुक्त लगता है। तबीयत से जुड़े कई मुहावरे और लोकोक्तियाँ उर्दू में मशहूर हैं। मसलन लोग कहते हैं कि उनको देखते ही तबीयत हरी  हो गई, यानी मन प्रसनन्न हो गया। किसी बुरी वस्तु को देखकर या बुरी बात का वर्णन सुनकर भी लोग कहते हैं कि तबीयत खराब हो गई, यानी चित्त खराब हो गया। उर्दू तबीयत हिन्दी मन का ही पर्याय है, इसमें कोई संदेह नहीं। किसी हिन्दी फिल्म का गीत है- पास बैठो तबीयत बहल जाएगी। मौत भी आ गई है तो टल जाएगी। इससे यह तो पक्का हो गया कि तबीयत का एक अर्थ मन भी है।
इसके बावजूद हिन्दी प्रान्तों में प्रायः लोग अस्वस्थता का बखान करने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं। आज तबीयत ठीक नहीं है। ज़नाब की तबीयत कुछ नासाज लग रही है। अमुक-अमुक की तबीयत बहुत दिनों से खराब है। इन सब वाक्यों में तबीयत से आशय स्वास्थ्य से ही है। भोजपुरी इलाकों में तबीयत सकारात्मक अवधारणा है। यानी तबीयत है, इसका आशय है कि स्वस्थ हैं। तबीयत नहीं है, इसका अभिप्राय है कि तबीयत खराब है। इसीलिए यदि कोई अस्वस्थ होता है तो भोजपुरी-भाषी कहते हैं, आज तबीयत ना बा। तबीयत को वे तबेयत भी कहें तो कोई आश्चर्य नहीं।
जिसका ज़िक्र अब तक हमने मन और तबीयत के पर्याय के रूप में किया, उसे अगर निर्भ्रान्त शब्दों में कहना हो तो कहेंगे- स्वास्थ्य(संस्कृत-हिन्दी) अथवा सेहत (उर्दू)। आजकल स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं चल रहा। अब अटलजी का स्वास्थ्य कैसा है? अब ज़नाब की सेहत कैसी है? इन सब वाक्यों में सेहत या स्वास्थ्य का अर्थ शरीर के भला-चंगा होने से है। इनके साथ यदि मानसिक शब्द जोड़ दें तो अभिप्राय होगा मन/मस्तिष्क का स्वास्थ्य।
किसी संत ने कहा था- चाह गई, चिन्ता मिटी, मनवाँ बेपरवाह। हमको कछू न चाहिए, हम साहों के साह। इससे भी स्पष्ट है कि चाह, चिन्ता और परवाह ये सब मन से जुड़ी संकल्पनाएं। मन यानी मस्तिष्क में घटित होनेवाली वे क्रियाएँ जो हमारे संज्ञान में हैं- ऐच्छिक क्रियाएं। इसमें वे अनैच्छिक क्रियाएं या भाव-दशाएं भी शामिल हैं, जिनके सामने हम लाचार हो जाते हैं और कह उठते हैं- ये दिल है कि मानता नहीं। यों चार शब्द भी वश या इच्छा का ही पर्याय है। लाचार या नाचार यानी जो वश में न हो और चार यानी जो वश में हो, जो हमारे मन के काबू में हो। इसीलिए मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने लिखा-
कौन मरता है मोहब्बत में, सभी जीते हैं। चार-ओ-नाचार ये ज़हराब सभी पीते हैं।
भारत और भुखमरी, बदहाली, गरीबी परस्पर पर्यायवाची रहे हैं। खाते-पीते, संपन्न लोगों की संख्या इस देश में बहुत कम ही रही है। आम आदमी तो अभावग्रस्त और गरीब ही होता आया है। इसलिए अभी हाल तक कोई व्यक्ति मोटा और पुष्ट दिखे तो यह माना जाता था कि वह स्वस्थ है। पतला-दुबला आदमी भी कभी स्वस्थ हो  सकता है, यह कोई नहीं सोचता था। इसलिए यदि कोई मुटा जाता था तो लोग कहते थे- वह थोड़ा हेल्दी है। बहुत मोटे व्यक्ति को बहुत हेल्दी कहनेवाले भी हैं। किसी की बेटी थोड़ी गदबदी हो तो लोग कहते थे- उनकी बिटिया थोड़ी स्वस्थ है। किसी युवक के डोले-शोले बने हों, सीना चौड़ा हो, बाहें और जाँघें भरी-भरी हों तो लोग कहते थे कि वह सेहतमंद है, और यदि उसने वर्जिश करके सेहत बनाई हो तो लोग कहते थे कि उसने सेहत कमाई है।
सेहत या स्वास्थ्य खराब न हो, यानी तन-मन के सारे विभाग ठीक से काम कर रहे हों तो उसे तन्दुरूस्त होना कहते हैं। हालांकि हमें तो यह लगता है कि तन्दुरुस्त शब्द तन + दुरुस्त से बना होगा, यानी तन का दुरुस्त या ठीक होना। इसी तर्ज़ पर मन+दुरुस्त बनता तो होता- मनदुरुस्ती। इस लिहाज़ से तन्दुरुस्ती का अर्थ हुआ तन या शरीर का स्वस्थ होना। लेकिन चलते-चलते यह शब्द अब तन और मन, दोनों के ठीक होने के लिए प्रचलित हो गया है। जब हम बच्चे थे तो एक साबुन का विज्ञापन रेडियो पर आता था- लाइफबॉय है जहाँ तन्दुरुस्ती है वहाँ...। लाइफबॉय तन के कीटाणुओं को धो डालता है। साबुन कीटाणुओं को पूरी  तरह धोता है या नहीं, यह तो वैज्ञानिक और डॉक्टर ही बता पाएँगे। लेकिन यह साबुन केवल तन की बात करता है, मन की नहीं। इससे इतना तो निश्चित हुआ कि इस साबुन के सन्दर्भ में तनदुरुस्ती का सम्बन्ध तन से ही है। यह दीगर बात है कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है।
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Tuesday, 4 August 2015

सेवा



व्यंग्य
सेवा
डॉ. रामवृक्ष सिंह
अपने देश के लोग बड़े सेवा-भावी हैं। जिसे देखिए वही सेवा करने को उतावला दिखता है। बच्चे पढ़-लिख लेते हैं तो सेवा खोजते हैं। सबसे ज्यादा अहमियत सरकारी सेवा को दी जाती है। सरकारी सेवा यानी देश की सबसे बड़ी सेवा। अब यह दीगर बात है कि हिन्दी जैसी वाहियात भाषा के प्रति अपने अहैतुक वैराग और अंग्रेजी के प्रति अत्यधिक अनुराग के चलते देश के ज्यादातर हिन्दी-भाषी सेवा और मेवा की वर्तनी में भेद नहीं कर पाते और दोनों को परस्पर अदल-बदल कर लिखने-पढ़ने लगे हैं। स्वभावतः वे उसी हिसाब से इनका अर्थ भी लगाते हैं। बड़ी सरकारी सेवा यानी बड़ा सरकारी मेवा। वैसे भी अपने समाज का यह स्वतः सिद्ध सूत्र है- जितनी महत्त्वपूर्ण सेवा-उतना विपुल मेवा। तो अपने देश के युवाओं और उनके पालकों की पहली प्राथमिकता होती है सरकारी सेवा। फिर आती है निजी क्षेत्र की सेवा। और जिन्हें इनमें से दोनों ही पाने या करने का मौका नहीं मिलता या जो सेवा के क्षेत्र में और भी ऊंचे झंडे गाड़कर अपना और अपने खानदान का नाम रौशन करना चाहते हैं वे करने लगते हैं स्वयं-सेवा। इसके लिए वे या तो कोई स्वयं-सेवी संगठन बना डालते हैं या खुद किसी ऐसे संगठन से जुड़ जाते हैं। अपने देश में ऐसे संगठनों की संख्या कई लाख हो गई है। अब यह आपके संस्कारों पर निर्भर है कि आप इन स्वयं-सेवी संगठनों को अपनी यानी उनकी खुद की सेवा करने वाला संगठन मानें या अपनी इच्छा से दूसरों यानी देश व समाज के लोगों की सेवा करनेवाला।
इन क्षेत्रों के अलावा भी अपने देश के सेवा-भावी लोगों के लिए एक बड़ा कर्म-क्षेत्र है, जिसे समाज-सेवा कहा जाता है। समाज एक व्यापक अवधारणा है, जिसकी सबसे छोटी इकाई है व्यक्ति। इसलिए प्रायः होता यही है कि समाज-सेवा की शुरुआत लोग खुद से ही करते हैं। उसके बाद परिवार का नम्बर आता है और यदि परिवार की सेवा के बाद भी सेवा करने का जोश बरकरार रहता है और उसी की आड़ में अपना घर भरने का सुअवसर दिखता है तो समाज को धन्य करने में भी गुरेज नहीं करते। लेकिन समाज-सेवा का केन्द्रीय तत्व है आत्म-सेवा। अंग्रेजी की कहावत है- चैरिटी बिगिन्स ऐट होम। इस कहावत के सही मायने समझने हों तो हमारे देश के समाज-सेवियों को नजदीक से देखें।

एक बार अमेरिका सिंह नाम के एक महाशय ने हमारे सुपुत्र के विवाह के सिलसिले में हमें फोन किया। हमारे और हमारे सुपुत्र के बारे में खूब पूछताछ की। जब उन्हें पता चला कि अभी हमें सेवा-निवृत्त होने में लगभग आठ साल बाकी हैं, तो चकित होते हुए पूछ बैठे- अरे भरती होते समय केतना कम लिखा दिए थे उमिरिया? हम क्या कहते! चुप रह गए। फिर हमने सौम्यतावश उनसे भी पूछ लिया- आप क्या काम करते हैं? तपाक से वे बोले- समाज-सेवा। हम उनका यह उत्तर सुनकर भाव-विह्वल हो उठे। हमारे मन में आनन्द की हिलोरें उठने लगीं। वाह! कोई फुल-टाइम, समर्पित समाज-सेवी हमारा समधी बनेगा, उसकी बिटिया हमारी वधू बनकर हमें और हमारे सुपुत्र को धन्य करेगी! यही सोच-सोचकर हम कुलाबे मिलाने लगे।

लेकिन हमारा यह सुख कुछ ही मिनट कायम रह सका। अमेरिका सिंह से फोन करने के बाद हमने अपने समाज के एक ऐसे सज्जन को फोन मिला लिया, जिनका जिक्र कुछ ही देर पहले अमेरिका सिंह ने अपनी बातचीत में किया था और जिन्हें संयोग से हम भी जानते थे। उन सज्जन ने अमेरिका सिंह की समाज-सेवा के जो किस्से सुनाए, उन्हें सुनकर हमारे होश उड़ गए। तब हमें समाज-सेवा के कुछ नए आयामों का पता चला।

मसलन- समाज-सेवा से आशय है, गाहे-ब-गाहे और अकसर बिना बुलाए तथा बिना सूचना दिए, और बिना समय या कुसमय का विचार किए, किसी भी परिचित के घर पधार जाना। फिर वहाँ बेतकल्लुफी से घंटों के लिए पंचायत जमा लेना, इधर-उधर की बतकही करना, दूसरों की खूब बुराई करना, अपने झूठे-सच्चे कारनामों की डींगें हाँकना, हो सके तो फोन करके दो-चार और लोगों को भी वहीं बुला लेना, सुबह के समय पधारे हों तो देर शाम तक या रात तक बैठक जमाए रहना, नाश्ता दर नाश्ता, चाय दर चाय और यदि आप सुरापान के शौकीन हों तो जाम दर जाम हजम करते जाना। फिर कोशिश यही करना कि रात के भोजन की दावत उड़ाकर वहीं रैन-बसेरा भी कर लिया जाए। अमेरिका सिंह का यह सुपरिचय पाकर हमने मन ही मन निर्णय कर लिया कि ऐसे महान समाज-सेवी से रिश्ता जोड़ने की हमारी औकात इस जन्म तो क्या अगले सात जन्म में भी नहीं बन पाएगी। इसलिए आगे से हम उन्हें पहचानकर भी पहचानने से इनकार कर देंगे। फिर चाहे वे हमें घोर असामाजिक और समाज-विरोधी ही क्यों न घोषित कर दें।

कभी-कभी ऐसे समाज-सेवी लोग हाथ में डंडा-झंडा लिए, कंधे पर झोला-झप्पड़ टाँगे, बसों या ट्रेनों में भरकर, झुण्ड के झुण्ड बिना टिकट ही शहर पहुँच आते हैं। फिर शहर की यातायात व्यवस्था को तहस-नहस करते हुए, सड़कों पर जत्थे के जत्थे चलते हुए राज्य की विधान-सभा तक पहुँच जाते हैं। वहाँ उनसे भी बड़े और धुरन्धर समाज-सेवक गण बारी-बारी से आकर उन्हें संबोधित करते हैं। इसे अपने देश में रैली कहते हैं। रैली यदि बहुत बड़ी हो तो कोई-कोई समाज-सेवी वैय्याकरण उसे रैला भी कह देते हैं। ऐसे नए-नवेले शब्द रचनेवाले यास्काचार्यों की अपने देश में कमी नहीं है। जो समाज-सेवी ऐसी रैलियों या रैलों में भाग लेने पहुँचते हैं, उनके लिए कभी-कभी नहाने-धोने और खाने-पीने की सुविधा रैलीकारों की ओर से की गई होती है। ('रैलीकार' हमारा खुद का पेटेंटेड शब्द है। इसे हमारी इजाजत के बिना कोई इस्तेमाल न करे)। साथ ही, उन्हें बुलाने वालों की ओर से कुछ रुपये भी मिलते हैं- ऐसा हमने सुना है। शहर की दुकानों में लूट-पाट, हुड़दंग और दिन भर नगर-दर्शन भी रैली-सेवा का ही हिस्सा माना जाता है। (रैली-सेवा भी हमारा अपना ईजाद किया हुआ शब्द है)।

गाँवों और नगरों में कुछ मौलिक सेवादार भी होते हैं, जो हर मौके पर सहज ही सेवा के लिए पहुँच जाते हैं। यदि किसी के घर में पारिवारिक विवाद हो जाए, या दो भाइयों में संपत्ति, खेत-बाड़ी के बँटवारे की नौबत आ जाए तो ये सेवक लोग सहर्ष उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे सेवकों के दर्शन-लाभ लेने हों तो पंचायत में जाएँ। पंचायत यानी पाँच लोगों का वह समूह जिसमें कथा-सम्राट प्रेमचंद ने न जाने किस मुहूर्त में और न जाने कौन-सा दिव्य चश्मा पहनकर और न जाने किस कोण से परमेश्वर के दर्शन कर लिए थे। इन पंचायतों में अकसर उस पक्ष के हितैषियों की संख्या अधिक होती है जो फैसले के बाद बेहतर सेवा-पानी मुहैया कराने की हैसियत और मंशा रखता हो। बल्कि पेशतर तो यह माना जाता है कि वह पंचों को पहले से ही सेवा-पानी कराकर लाया हो। न लाया हो तो मनमाफिक निर्णय हो जाने पर खूब शानदार सेवा-पानी का वादा तो किया ही हो।

सेवा का अभिप्राय किसी को खिलाना-पिलाना, आव-भगत करना और हाथ-पाँव दबाना ही नहीं होता। जैसे-जैसे समाज ने तरक्की की है, सेवा शब्द के भावार्थ में भी खासी तरक्की हुई है। अब किसी के हाथ-पाँव तोड़ना और गरदन दबाना भी सेवा की परिधि में आने लगा है। किसी दादा या मवाली के चक्कर में फँस जाएं और वह अपने गुर्गों से कहे कि ज़रा इनकी खातिर-तवज्जो या सेवा-पानी कर दो तो समझ लीजिए कि उसके बाद आपको मरहम-पट्टी कराने अथवा पलस्तर चढ़वाने के लिए अस्पताल भी जाना पड़ सकता है और यदि सेवा उससे भी गहनतर हो गई तो सीधे बैकुण्ठ-धाम भी। अब यह आप पर निर्भर है कि आप अपनी कितनी सेवा झेलने की ताकत रखते हैं।

अभी कुछ दिन पहले एक अखबार में पढ़ा कि अपने देश के बहुत-से युवा राजनीति को भी कैरियर-विकल्प मानने लगे हैं। सच कहें तो देश-सेवा का इससे अच्छा कोई और विकल्प हो भी नहीं सकता। इस देश को ऐसे सेवकों की बहुत सख्त ज़रूरत है। संसद से लेकर सड़क तक, शहर से लेकर गाँव तक, हर जगह राजनीतिक सेवकों की अच्छी-खासी माँग रहती है। इज्जत भी है और कमाई भी। नाम भी और दाम भी। पढ़ाई-लिखाई की हो तो भी ठीक, नहीं की हो तो भी ठीक। इस मामले में लालच नहीं करने का। दिल्ली में नकली डिग्री वाले कुछ मंत्री लोग पकड़े गए तो मन को बड़ी
ठेस लगी। जब अनपढ़ होकर भी मंत्री बना सकता है तो नकली डिग्री दिखाकर खाली-पीली आफत क्यों मोल लेने का
! नेता बनने के लिए क्या चाहिए? बस बातें बनाना आता हो। यदि कुछ कम आता हो तो भी चलेगा। बस पागल और दिवालिये न हों और उम्र पच्चीस वर्ष से ऊपर हो। मतदाता सूची में नाम हो। अनिवार्य योग्यता तो बस इतनी-सी है। मन में देश-सेवा का जज्बा हो। न हो तो भी चलेगी। लेकिन किसी तरह मतदाताओं को यकीन हो जाए कि यह व्यक्ति उनकी अच्छी तरह सेवा कर सकता है। कुछ वांछनीय योग्यताएं भी हैं जो सर्वज्ञात हैं। उनका ज़िक्र करके चर्वण का चर्वण क्या करना! बस यूँ समझ लीजिए कि राजनीति के क्षेत्र में भी सेवा के स्वर्णिम अवसर उपलब्ध हैं।

अपने देश की अर्थ-व्यवस्था में सेवा क्षेत्र की बहुत अहमियत है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान पचपन प्रतिशत से भी अधिक है। इसी से इसके महत्त्व को समझा जा सकता है। हो भी क्यों नहीं, अपने देश का हर आदमी तो किसी न किसी प्रकार की सेवा में जुटा हुआ है! अहर्निशं सेवामहे! वैसे तो यह नारा अपनी जीवन बीमा कंपनी का है, लेकिन देश के करोड़ों दूसरे लोग भी रात-दिन सेवा-कार्य में जुटे हैं। ऐसे देश-सेवकों को हमारा शत-शत नमन।